सम्राट हरिश्चन्द्र जी का गौरव - गाथा भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। उन्होंने सत्यनिष्ठा और कर्तव्य-परायणता का जैसा आदर्श प्रस्तुत किया है, वह विश्व इतिहास में अत्यंत दुर्लभ है। विष्णुपुराण के अनुसार हरिश्चन्द्र जी का जन्म अयोध्या के इश्वाकु वंश में अट्ठाइसवें पीढ़ी में हुआ था, जबकि स्कन्दपुराण के 'शिहाद्रि खण्ड के अनुसार वॆ अयोध्या के राजवंश के 24 वॆ राजा थे |
कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार हरिश्चन्द्र जी का जन्म मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम से 35 पीढ़ी पूर्व हुआ था। उनके पिता का नाम सत्यव्रत था यह त्रिशंकु के नाम से प्रसिद्ध हए । हरिश्चन्द्र की माता का नाम सत्यरथा था । हरिवंश पुराण (13.24-25) के अनुसार, "त्रिशंकु के कैकेय वंश में उत्पन्न हुई सत्यरथा नाम की पत्नी थी, जिससे उसके हरिश्चन्द्र नाम वाला पुत्र उत्पन्न हुआ। वे हरिश्चन्द्र Trashdaw नाम से प्रसिद्ध थे। उन्होंने राजसूय यज्ञ किया, अतएव वे सम्राट कहलाते थे।
हरिश्चन्द्र के पिता की कथा-
हरिचन्द्र के पिता सत्यव्रत अत्यंत धर्मात्मा तया पराक्रमी थे | उन्होंने बहुत सारे य किए थे। अश्वमेध यज्ञ से उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। ख्याति और पराक्रम ने उसे दम्भी बना दिया। यह विश्वास हो गया था कि अपने पराक्रम से बह चाहे जिसे जीत सकता है। इसी दम्भ के कारणा उन्होंने देवलोक ( वर्तमान तिब्बत ) पर विजय प्राप्त करने की सोची उस समय देवलोक को विशिष्ट स्थान प्राप्त था और अयोध्या से उसके बहुत मधुर एवं प्रगाढ़ सम्बन्ध थे। राजर्षि वशिष्ठ ने उसकी योजना का विरोध किया। उसका साथ देने के कोई तैयार नहीं हुआ, परन्तु फिर भी वह अपनी बात पर अड़ा रहा। क्षब्ध होकर उसके पिता ने त्रय्यारुढ़ ने उसे राज्य से निकल दिया और चण्डाल होने का श्राप दिया ।
सत्यव्रत चण्डालों की बस्ती में रहने लगा। उस समय कान्यकुब्ज (वर्तमान कन्नौज) में सुप्रसिद्ध राजा कुशिक का पौत्र तथा गाधि का पुत्र विश्वरथ सिंहासन पर आरुढ़ था। वह अत्यन्त विद्वान तथा पुरुषार्थी था अपने अपार ज्ञान के कारण विश्वरथ महर्षि विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए।
अयोध्या के कुल पुरोहित होने के कारण उस समय वशिष्ठ अप्रत्यक्ष रूप से अयोध्या के शाशन का संचालन करते थे, इस कारण विश्वामित्र तथा वशिष्ठ में परस्पर प्रतिम्पर्धा बनी रहती थी। वशिस्ट अत्यंत शील स्वभाव के थे, जबकि उनके विपरित विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधी व हठी प्रकृति के थे।
उदयपुर प्रशस्ति से ज्ञात होता है किएक बार आबू पर्वत पर विश्वामित्र ने वशिष्ठ मुनि की कामधेनु गाय छीन ली। वशिष्ठ के बहुत कहने पर भी जब विश्वामित्र ने उनकी गाय नहीं लौटई तो वशिष्ठ ने यज्ञ कर अग्नि द्वारा एक वीर पुरुष की उत्पत्ति की जो अपने पराक्रम से कामधेनु को वापस लौटाया।
वशिष्ठ ने उस वीर पुरुष को परमार नाम दिया। इसी परमार से राजपूतों का परमार वंश चला । नागपुर शिलालेख, पूर्वपाल का बसंतगढ़ शिलालेख, आबू पर्वत शिलालेख, पाटनारायण शिलालेख एवं अर्थुना शिलालेख से भी इस कथन की पुष्टि होती है। कोध एवं ईष्यावश एक रात्रि विश्वामित्र वशिष्ठ का बध के लिए उनके आश्रम पहुंचे। अवसर की तलाश में वह वशिष्ठ की कृटि के पीछे छिपकर खड़े हो गये चांदनी रात थी । उसी समय उनके कानों में राजर्षि वशिष्ठ का स्वर सुनाई पड़ा। वे अपनी पत्नी से कह रहे थे - देवी इस चंद्र को देखो। इसकी धवल चांदनी चारो तरफ अपनी आभा इस प्रकार विखे रही है जैमे विश्वामित्र की विमल कृति आज इस धरती पर दुर-दुर तक फैली है। उन जैसा ज्ञानवान् और धर्मात्मा राजा आज इस पृथ्वी पर कोई नहीं है। मन करता है की उनकी चरण-वंदना करूं। वशिष्ठ के इन बचनों को सुनकर ? विश्वामित्र उनके चरणों में गिर पड़े उनसे अपने जघन्य अपराध की क्षमा मांगी। वशिष्ठ ने कहा हे राजन, इसके लिए तुम सत्य की आराधना करो तभी तम्हारा ह्रदय निर्मल एवं पवित्र हो सकता है |
विश्वामित्र अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप कर महा तप में लीन हो गए | इससे विश्वामित्र की कृति दूर दूर तक फैलने लगी, परन्तु ह्रदय में वशिष्ट के प्रति ईर्ष्या समाप्त नहीं हुई| राज्य से निष्कासित सत्यव्रत भ्रमण करते हुए उनके आश्रम पहुँचा और अपने निष्कासन के लिए राजर्षि वशिष्ठ को दोषी ठहराते हुए उसने देवलोक को विजय करने की इच्छा व्यक्त की। विश्वामित्र को वशिष्ठ से बदला लेने का यह अच्छा अवसर समझ आया। सत्यव्रत को साथ लेकर वे आयोध्या पहुँचे और त्रय्यारुढ़ तथा वशिष्ठ को इस कार्य के लिए सहयोग करने का अनुरोध किया, परन्तु दोनों ने ही उनसे स्पष्ट इनकार कर दिया । धर्मप्रिय राजकुमार हरिश्चन्द्र ने भी इस कार्य को शास्त्रसम्मत न बताते हुए, इससे अपनी असहमति व्यक्त की । हरिश्चन्द्र की असहमति उनके प्रति विश्वामित्र की नराजगी का कारण बनी, जिसका परिणाम बाद में हरिश्चन्द्र जी को भोगना पड़ा और अयोध्या का राजपाट छोड़कर उन्हें अपनी पत्नी व पुत्र सहित काशी के बाजार में बिकना पड़ा।
विश्वामित्र ने सत्यव्रत के लिए यज्ञ प्रारम्भ किया, जिसमें न तो अयोध्या का सहयोग मिला न ही देवलोक का। इसके प्रतिकार स्वरुप उन्होंने सत्यव्रत को देवलोक विजय हेतु भेजा, परन्तु युद्ध में देवताओं ने सत्यव्रत को परास्त किया और पृथ्वी पर वापस भेज दिया। अपने हठी स्वभाव के कारण विश्वामित्र ने सत्यव्रत के लिए नए स्वर्ग की रचना की और वहाँ का राजा नियुक्त किया। यह स्थान त्रिशंकु नामक नगर था, जहाँ विश्वामित्र की तपस्थली के रुप में तीन पुष्कर क्षेत्र थे। इन्हीं तीन पुष्कर क्षेत्रों के कारण यह स्थान त्रिशंकु नामक नगर के नाम से विख्यात था। यह नगर वर्तमान सम्भल क्षेत्र है। शब्द विपर्यय से स्थान का नाम 'सत्यव्रत' और व्यक्ति का नाम 'त्रिशंकु' पड़ गया। आज भी स्कन्द पुराण में 'सम्भल 'महात्य' में सम्भल का प्राचीन नाम 'सत्यव्रत' ही मिलता है । उस समय मध्य हिमालय क्षेत्र अंतरिक्ष' कहलाता था। अयोध्या से मध्य हिमालय क्षेत्र जाते समय विश्वामित्र का तीन पुष्कर क्षेत्र वाला त्रिशंकु नगर अंतरिक्ष के निकट होने से अन्तरिक्ष कहलाया। इस प्रकार सत्यव्रत को अन्तरिक्ष में स्थित कहा गया। अज्ञानतावश आज लोगों में यह भ्रम फैला हुआ है कि अन्तरिक्ष का यह स्वर्ग कहीं आकाश में स्थित है जहाँ सत्यव्रत त्रिशंकु की भाँति उलटा लटका रहा । सत्यव्रत ने अपनी पत्नी सत्यरथा और पुत्र हरिश्चन्द्र को त्रिशंकु नगर बुलाना चाहा, परन्तु सत्यरथा हरिश्चन्द्र को अधर्म के मार्ग पर नहीं चलने देना चाहती थी, इस कारण न तो वह स्वयं पति के पास गई और न ही हरिश्चन्द्र को भेजा।
सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के राज्य में सर्वत्र सुख, शान्ति और वैभव का साम्राज्य था। उनकी धर्मप्रियता, न्यायप्रियता और सत्यप्रियता दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। वे प्रजा का पालन पुत्रवत करते थे तथा प्रजा भी उन्हें पिता समान मानती थी। परन्तु उनके कोई संतान न थी, जिसके कारण मन ही मन वह अत्यन्त दुःखी रहते थे।
भागवतपुराण (9.7.8- 9) के अनुसार नारद जी के कहने से वे वरुण देवता की शरण में गए और उनसे पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना करतें हु कहा "महाराज! यदि मेरे वीर पुत्र उत्पन्न हुआ तो मैं उसी से आपका यजन करूँगा।" वरुण ने कहा- ठीक है। तब वरुण की कृपा से हरिश्चन्द्र के रोहित नाम का पुत्र हुआ।
सोडनपत्यो विष्ण्णात्मा नारदस्योपदेशतः ।
वरुणं शरणं यातः पुत्रों में जायतां प्रभो ॥8॥
यदि वीरो महाराज तेनैव त्वां यजे इति ।
तथेति वरुणेनास्य पुत्रो जातस्तु रोहितः ॥१
पुत्र होते ही वरुण ने आकर कहा-“हरिश्चन्द्र''! तुम्हें पुत्र प्राप्त हो गया। अब इसके द्वारा मेरा यज्ञ करो ।" हरिश्चन्द्र ने कहा “जब आपका यह यज्ञ-पशु (रोहित ) दस दिन से अधिक का हो जायेगा, तब यज्ञ के योग्य होगा।" दस दिन बितने पर वरुण ने आकर फिर कहा- "अब मेरा यज्ञ करो" हरिश्चन्द्र ने कहा-"जब आपके यज्ञ-पशु के मुँह में दाँत निकल आयेंगे, तब यज्ञ होगा।" दाँत उग आने पर वरुण ने कहा-"अब इसके दाँत निकल आये, मेरा यज्ञ करो।" हरिश्चन्द्र ने कहा-"जब इसके दूध के दाँत गिर जायेंगे, तब यज्ञ के योग्य होगा।"दूध के दाँत गिर जाने पर वरुण ने कहा-"अब इसके दूध के दाँत गिर गए, मेरा यज्ञ करो । "हरिश्चन्द्र ने कहा- "जब इसके दोबारा दाँत आएंगे तब यह यज्ञ-पशु के योग्य हो जायेगा।" दांतों को फिर उग आने पर वरुण ने कहा- "अब मेरा यज्ञ करो।" हरिश्चन्द्र ने कहा- 'अरुण महाराज! क्षत्रिय पशु तब यज्ञ के योग्य होता है, जब वह कवच धारण करने लगे।" इस प्रकार हरिश्चन्द्र पुत्र प्रेम के कारण समय टालते रहे। जब रोहित को इस बात का पता चला कि पिता उसका बलिदान चाहते हैं, तब वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए हाथ में धनुष लेकर वन चला गया। कुछ दिन बाद उसे मालूम हुआ कि वरुण देवता ने रुष्ट होकर मेरे पिताजी पर आक्रमण किया है, जिसके कारण वे महोदर (जलोधर) रोग से पीड़ित हो गए हैं, तब रोहित अपने नगर की ओर चल पड़ा। इन्द्र ने उसे रास्तें में ही रोक दिया। उन्होंने कहा- "बेटा रोहित! यज्ञ-पशु बनकर मरने की अपेक्षा तो पवित्र तीर्थ और क्षेत्रों का सेवन करते हुए पृथ्वी में विचरना ही अच्छा है।" इन्द्र की बात मानकर वह एक वर्ष वन में ही रहा । इसी प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवें वर्ष भी रोहित ने अपने पिता के पास जाने का विचार किया; परन्तु बुढ़े ब्राह्मण का वेश धारण कर हर बार इन्द्र आते और उसे रोक देते । इस प्रकार छः वर्ष तक रोहित वन में ही रहा। अन्त में रोहित अपने पिता के पास गया । इन्द्र ने रोहित को उपदेश दिये, उनका उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में किया गया है।
कई श्लोकों के माध्यम से इन्द्र ने रोहित को उपदेश दिया कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में उन्नति चाहने वालो को निरन्तर गतिशील रहना चाहिए । बिना प्रयास किये सफलता नहीं मिलती। अतः व्यक्ति को सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। जो व्यक्ति आलसी बन प्रयास नहीं करते उनकी गति कलियुग के सामान अर्थात् निकृष्टतम् हो जाती है और जो पूर्ण उत्साह से कर्म करते हैं, उन्हें सतयुग जैसे फल की प्राप्ति होती है । मनुष्य को सूर्यदेव का अनुसरण करना चाहिए, जो बिना रुके सदैव अपने कार्य में लगे रहते हैं। इसलिए रोहित तुम निर्भय होकर अपने पिता के पास जाओ और अपने धर्म का अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करो
इन्द्र से उपदेश ग्रहण कर रोहित अपने पिता हरिश्चन्द्र से मिलने चल दिया। रास्ते में उसकी भेंट अजीगर्त मुनि से हुई उस समय बहुत ही विपन्न स्थिति में थे । उन्होंने अरजीगर्त को धन देकर उसके मंक्षले पुत्र शुनः शेप को यज्ञ-पुरुष हेतु खरीद लिया। उसे अपने पिता को सौंपकर रोहित ने उनके चरणों में नमस्कार किया। तब हरिश्चन्द्र ने जलोधर रोग से छूटकर पुरुषमेध यज्ञ द्वारा वरुण आदि देवताओं का यजन किया। इस यज्ञ में विश्वामित्र जी होता बने । उसी समय इन्द्र ने प्रसन्न होकर हरिश्चन्द्र जी को एक सोने का रथ दिया। विश्वामित्र ने प्रजापति वरुण आदि देवताओं की स्तुति कर अपने भांजे भृगुवंशी अजीगर्त के पुत्र शुनः शेप को पाशबन्धन से छुड़ा लिया और उसे अपने पुत्र रुप में स्वीकार किया।
ऋगवेद के प्रथम मण्डल के 24वें सूक्त में शुनः शेप की बली देने का प्रसंग आया है। शुनः शेप उत्तर वैदिक सामाजिक संरचना एवं रीति-रिवाज पर काफी प्रकाश डालता है । यह प्रकरण ब्राह्मण वर्ग की अत्यन्त सुदृढ़ स्थिति पर प्रकाश डालने के लिए पर्याप्त है । ऐतरेय ब्राह्मण में उल्लिखित है कि जब वरुण से कहा गया कि राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र के स्थान पर ब्राह्मण पुत्र (शुनः शेष) की बलि दी जायेगी तो वरुण ने कहा कि ब्राह्मण तो क्षत्रिय से उत्तम समझा ही जाता है (ऐतरेय ब्राह्मण, 3/43), अतः बलि दी जा सकती है । ब्राह्मण को उस काल में दिव्य वर्ग कहा गया है। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, 1/2/6) और उसमें समस्त देवताओं का निवास माना गया है ( तैत्तिरीय अरण्यक, 2/ 15 )। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार राजा पर निर्भर होने पर भी ब्राह्मण राजा से श्रेष्ठ । (शतपथ ब्राह्मण 1/ 2/3 /3 )। वाजसनेयी संहिता में भी ब्राह्मण को राजा से उत्तम कहा गया है ( वाजसनेय संहित, 1/21)। अथर्ववेद के अनुसार ब्राह्मण को कष्ट मिलने पर जल में टुटी हुई नाव की तरह राजा नष्ट हो जाता है ( अथर्ववेद, 5/19/8/15) शतपथ ब्राह्मण राजा की शक्ति का आधार ब्राह्मण को मानता है। (शतपथ ब्राह्मण, 4/1/4/6,12/7/3/12 ) हरिश्चन्द्र जी के सम्मुख जो विपत्तियाँ आई, उनके केन्द्र बिन्दु ब्राह्मण ही थे। हरिश्चन्द्र जी के लिए वशिष्ठ एवं विश्वामित्र पक्षी बन आपस में लड़ते रहे, जिसका परिणाम हरिश्चन्द्र जी को भोगना पड़ा।


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